मेरी मामी घर आई।
उपहार स्वरुप वो मेरे लिए ,
इक नीली फ्रॉक लाई।
इतनी सुन्दर फ्रॉक देख कर,
उछल पड़ा मेरा मन,
नाच कूद कर, घूम फिर कर,
कर दिया सबको दंग।
पहन के देखा जब उसको मैंने,
पूरे घर में लगी इठलाने,
क्या भाव होंगे मेरे मित्रों के,
यही सपने मैं लगी सजाने।
जन्मदिन का दिन फिर आया,
पापा ने पूरा घर सजाया।
मम्मी ने खूब खाना बनाया,
भाई मेरा केक भी लाया।
दोस्तों ने आते ही कोहराम मचाया,
सारा घर सर पर उठाया,
मेरी नीली फ्रॉक देख कर,
उनका मन भी ललचाया।
पार्टी के समय जब मैं,
नीली फ्रॉक पहन कर आई,
सबने खूब तारीफ करी और,
सबके मन को मैं ही भाई।
फिर पूछा यह लाई कहाँ से,
परी बन कर तू आई कहाँ से?
मैंने कहा तितलियाँ रंग भारती जहाँ से,
मेरी यह फ्रॉक आई है वहां से।
—विदिशा पार्थ